जो सावन में हरे रहते, हमेशा फूल फलते है,
जेठ की धूप पौधों पर कहा कोंपल निकलते है,
अग्निपथ जिन्दगी है, इसमें मौसम की रज़ा क्या हो
लक्ष्य तक वो पहुँचते जो समय के साथ चलते है।
प्रीति 'विश्वास', दिल्ली
तदबीर का खोटा है मुकद्दर से लड़ा है
दुनिया उसे कहती है के चालाक बड़ा है
खुद तीस का है दुल्हन साठ बरस की
गिरती हुई दीवार के साये में खड़ा है।
पापूलर मेरठी, मेरठ
किसे जाकर जमाने में ये अपना गम बताऊँ मैं
कहो किस नाम से तुम को भला हरदम बताऊँ मैं
तुम्हें बस देखने भर से नशा कुछ हो गया ऐसा
तुम्हें ठर्रा की बोतल या कि व्हिस्की रम बताऊँ मैं
शम्भु शिखर, दिल्ली
रंग अबीर गुलाल छोड़िये माटी अपनी ही चंदन है
इस माटी के तिलक लगाकर सबको होली अभिनन्दन है
राजेश चेतन, दिल्ली
प्रिये गांव मेरे तू चल, तेरे शहर में क्या धरा है
वहा बोली में है शहद, यहा बोतलों में भरा है
रमेश शर्मा, राजस्थान
इस कार्यक्रम में श्री आस करण 'अटल', श्री गजेन्द्र सोलंकी, श्री महेन्द्र अजनबी, डा॰ टी एस दराल ने भी काव्य पाठ किया परन्तु आग्रह के बाद भी काव्य पंक्तियां लिखी नहीं अतः खेद है उसे प्रकाशित नहीं कर पाया।

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