Wednesday, February 13, 2008

मदनोत्सव


सत्य शिव और सुंदरम्, गूंजे जग में राग
नफरत हिंसा छोड़कर, आओ खेलें फाग


सत्यम शिवम सुन्दरम भारत की संस्कृति का ध्येय वाक्य है। फागुनी होली सत्यम शिवम सुन्दरम का प्रतीक है। असत्य का प्रतीक होलिका जल गई और प्रहलाद के रूप में सत्य का प्रकटीकरण हुआ। कई बार सत्य के प्रकटीकरण में कुछ विलम्ब जरूर हो जाता है परन्तु अंतिम विजय सदैव सत्य की ही होती है। सृष्टि की रक्षा के लिए शिव ने विषपान किया। होली हमें सिखाती है कि हम सब भेद भाव भुलाकर, कड़वाहट समाप्त कर, प्रेम प्यार का प्रतीक रंग गुलाल, अबीर एक दूसरे को लगायें। प्रकृति पर बसन्त छाया है खेतों में फसल लहरा रही है, मौसम में रंगत है, साक्षात कामदेव भी धरती पर उतरने को आतुर है, मतलब चारो ओर सुन्दर ही सुन्दर। यहाँ पर मैं ब्रज की होली का उल्लेख जरूर करना चाहूँगा। वेलेनटाईन मनाने वाली पीढ़ी को होली का उत्सव देखने एक बार वृन्दावन जरूर जाना चाहिये। कृष्ण राधा की भक्ति में डूबे ब्रजवासियों का होली उत्सव रंग अबीर गुलाल केसर से लेकर लठमार तक अदभुद अन्दाज का होता है। वृन्दावन की तरह समस्त भारत में कभी मदनोत्सव के रूप में एक माह तक होली का त्यौहार मनाया जाता था आज इस तनाव भरे अर्थयुग में कहाँ गया वह होली का उत्साह। सत्यम शिवम सुन्दरता को प्रकट करने वाला त्यौहार होली हमारे दरवाजे है। मैं नहीं कहता कि टैंशन फ्री पत्रिका के माध्यम से हम भारत में पुनः मदनोत्सव ला पायेंगे परन्तु आपके जीवन को शब्दों की पिचकारी के माध्यम से मदमस्त करने का एक गिलहरी जैसा विनम्र प्रयास हमारा जरूर है। टैंशन फ्री मुस्कान बांटने का एक आन्दोलन है और इस आन्दोलन में आप की सक्रिय भागीदारी होगी, ये विश्वास है। आइए होली के इस बासन्ती प्रेम उत्सव पर आप पर काव्य की पिचकारी चलाता हूँ -

सर्दियों की कंपकपी का अन्त है
दर पे दस्तक दे रहा बसन्त है
फूल केसर का हवा में झूमता
पीत वस्त्रों में सजा ज्यूं सन्त है
काम कोई कैसे बिगड़े इस घडी
दे रहा आशीष जब इकदंत है
देखिये कुदरत की रंगत देखिये
गंध कैसी छाई दिगदिगन्त है
प्यार का खुला निमत्रंण है तुम्हे
प्रेम की भाषा सखी अनन्त है
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