Tuesday, June 24, 2008

भारतवंशियों की तीसरी पीढ़ी सीख रही है हिंदी

कहते हैं कि सात समंदर पार रहें या कि रेगिस्तान में; अपना घर, वतन की मिंट्टी, मातृभाषा और मां के हाथ के बने खाने का स्वाद नहीं भूलता। मामला भाषा का हो तो गंभीरता और भी बढ़ जाती है। संस्कृति, संस्कार और अपनी मूल पहचान को बनाये रखने के लिए अपनी भाषा से जुड़ा रहना जरूरी है। इस सत्य को अमेरिका-कनाडा में बसे भारतवंशी अच्छी तरह से जानते हैं। वहां कई शहरों में तीसरी पीढ़ी को हिंदी सिखाने की मुहिम चल रही है। इसके लिए प्रवासियों ने अपने बूते पर कई स्कूल शुरू करके हिंदी सिखाने का अभियान छेड़ दिया है।

जड़ों से जुड़ाव की चिंता

लगभग 30 से 40 साल पहले इन देशों में पहुंचे भारतीयों ने अपने बच्चों को न केवल अच्छी हिंदी सिखाई, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति व संस्कारों से सराबोर भी रखा। यह बच्चे बड़े होते-होते पाश्चात्य शैली में भले ही रंग गये हों, पर हिंदी से दूर नहीं हुए। इनकी तीसरी पीढ़ी के हिंदी व हिंदुस्तान से सरोकार उतनी मजबूती से नहीं जुड़ पाये, तो प्रवासियों को चिंता हुई। इसी चिंता का परिणाम है कि उन्होंने तीसरी पीढ़ी को हिंदी सिखाने की मशक्कत शुरू की दी।

छेड़ दी योजनाबद्ध मुहिम

आज अमेरिका के लगभग हर शहर में इस मुहिम के रंग भरने शुरू हो गए हैं। अमेरिका व कनाडा के मंदिरों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, परंतु अमेरिका के न्यूजर्सी में हिंदी यूएसए ने इस मुहिम को अत्यंत योजनाबद्ध तरीके से तेज किया है। हिंदी यूएसए के संचालक देवेंद्र सिंह व उनके साथियों ने 'ंिहंदी की अगर हम सब इक ज्योति जला पायें, तब साथ जुड़ेंगे सब, बच्चे भी संवर जाएं' के उद्घोष के साथ मुहिम शुरू करते हुए न्यूजर्सी व कनाडा में 25 स्कूल स्थापित किये हैं जिनमें लगभग डेढ़ हजार बच्चे हिंदी सीख रहे हैं। 5 से 15 साल आयु वर्ग के इन बच्चों को अक्षर ज्ञान, शब्द ज्ञान, हिंदी बोलना, पढ़ना व लिखना सिखाने के साथ शुद्ध उच्चारण सिखाया जाता है।

अलग से बनाया पाठ्यक्रम

ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ कुछ शब्द सीख कर घरों में बैठ जाते हों। उनके लिए अलग से पाठ्यक्रम भी तैयार किये गये हैं। हिंदी यूएसए ने पाठ्यक्रम के अनुसार 8 पुस्तकें तैयार की हैं। इस मुहिम में 115 से अधिक प्रवासी स्वयंसेवक जुड़े हुये हैं और इसे लगातार विस्तार देने की कोशिशें जारी हैं। हिंदी सीख रहे बच्चों की बाकायदा परीक्षा होती है। मूल्यांकन के बाद जल्दी हिंदी सीखने वाले बच्चों को पुरस्कृत किया जाता है।

यहां बच्चों को भारतीय त्योहारों, उत्सवों, मौसम, संस्कारों, गौरवशाली इतिहास व प्रेरक महापुरुषों के बारे में जानकारियां देकर उत्सव मनाये जाते हैं। गीत संगीत, नाटक आदि की प्रतियोगिताएं होती हैं। देवेंद्र सिंह कहते हैं, ''मुहिम में भारतवंशी तेजी से जुड़ रहे हैं। हम सबकी साझा कोशिश है कि हमारी तीसरी पीढ़ी हिंदी के साथ हिंदुस्तान को भी आत्मीयता से जान समझ सके!''

[डॉ. सुरेश अवस्थी]
saabhar-dainik jagran
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