Thursday, February 7, 2008

वातावरण

हंसना और हंसाना मित्रों मुझको भी तो आता है
द्विअर्थी संवादों से मन मेरा घबराता है
भौंडे फिल्मी गाने सुनना हमें सुहाना लगता है
सँस्कारों की अर्थी पर फूल चढाना पड़ता है
पश्चिम का ये नंगापन हमको तो स्वीकार नही
इस बेशर्मी का सब मिलकर करते क्यों प्रतिकार नही
युवा पीढी बरबादी से मन मेरा जब डरता है
वातावरण देखकर मुझको आग उगलना पड़ता है ॥ 1 ॥

कवि लेखक साहित्यकार क्या अपना फर्ज निभाता है
गली गली में घूम घूम क्या माँ का दर्द सुनाता है
केवल ताली पिटवा लेना कवि का कर्म नही होता
ऊल जलूल को कविता कहना लोगों धर्म नही होता
कवि समाज का दृष्टा होता राष्ट्र जागरण करता है
नेता हो या नगर सेठ वह नही किसी से डरता है
कवि धर्म की मर्यादा का ध्यान नहीं जब रखता है
वातावरण देखकर मुझको आग उगलना पड़ता है ॥ 2 ॥

लोकतन्त्र का स्तम्भ साथियों पत्रकार हमारा है
विज्ञापन अखबार बेचना उसको सबसे प्यारा है
पत्रकार सम्मेलन भी जब मंडी सा बन जायेगा
लोकतन्त्र की मर्यादा को कैसे कौन बचायेगा
कलम सिपाही कलम ना बेचो ये हथियार तुम्हारा है
सौ करोड़ लोगों के स्वर का तू ही एक सहारा है
लोकतन्त्र का रक्षक ही जब अंधियारे में दिखता है
वातावरण देखकर मुझको आग उगलना पड़ता है ॥ 3 ॥

स्वार्थ के चक्कर मे हम ही रिश्वत को अपनाते हैं
जरा काम जो रूक जाये तो जाकर भेंट चढाते हैं
रिश्वत लेना बहुत बुरा है रिश्वत देना पाप कहो
दो कोड़ी के लोगों को काहे को तुम बाप कहो
बाते बडी बडी करते हो भ्रष्टाचार मिटाने की
खुल्लम खुल्ला रिश्वत देते बाते नही शर्माने की
भ्रष्टाचारियों के कारण जब जग भारत पर हँसता है
वतावरण देखकर मुझको आग उगलना पडता हे ॥ 4 ॥
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