Tuesday, January 29, 2008

क्या खोया क्या पाया

क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं
आओ साथियों, देशवासियो
भारत तुम्हें दिखाते हैं ॥
जिस गौ को गौमाता कहकर
गाँधी सेवा करते थे
जिसके उर में सभी देवता
वास हमेशा करते थे
हिन्द भले ही मुक्त हुआ हो
गौमाता बेहाल अभी
कटती गऊएँ किसे पुकारें
उनके सर है काल अभी
गौमाता की शोणित-बूँदें
जब धरती पर गिरती हैं
तब आज़ादी की व्याख्याएँ
ज्यों आरी से चिरती हैं
गौ भारत का जीवन-धन है
हिन्दू चिन्तन की धारा
गौमाता को जो काटे, वह
है माता का हत्यारा
कृष्ण कन्हैया की गऊओं की
गाथा करुण सुनाते हैं
कया खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं ॥
हिन्द देश की भाषा हिन्दी
संविधान में माता है
मैकाले की अँग्रेजी से
भारत जाना जाता हैं
राजघाट से राजपाट तक
अँग्रेजी की धूम बड़ी
औ’ हिन्दी, झोपड़-पटटी में
कैसी है मजबूर खड़ी
न्यायालय से अस्पताल तक
भाषा अब अँग्रेजी है
हिन्दी संविधान में बन्दी
रानी अब अँग्रेजी है
मन्त्री जी से सन्त्री जी तक
बोलें सब अँग्रेजी में
हर काँलिज, हर विद्यालय में
डोंलें सब अँग्रेजी में
अपनी भाषा हिन्दी से हम
क्यों इतना कतराते हैं
क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं ॥
वंशवाद में नेतओं की
चालें बड़ी फरेबी है
माता कुर्सी पर बलिहारी
बेटे औरंगजेबी हैं
दूर विदेशों मे पढता अब
भारत भाग्य विधाता है
भारत की माटी से उसका
केवल कुर्सी नाता है
नेतागण कुर्सी-महिमा का
साँस लिए बिन पाठ करें
जनता भूखी, नेताज़ी के
कुत्ते, बिल्ली ठाठ करें
वंशवाद के मकड़जाल से
सिंहासन छुड़वाना है
भारत की इस पुण्य-भूमि पर
राम राज्य अब लाना है
नेताओं के हथकण्डों से
लोगो तुम्हें जगाते है
क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते हैं ॥
वर्ण-व्यवस्था भारत-भू पर
सदियों से चलती आई
जिसका जो भी काम है उसकी
जाति वही है कहलाई
जाने कब से इस समाज में
छुआ-छात की बू आई
इसी भूल ने भारत-भू को
भारी चोट है पहुँचाई
नेताओं ने आरक्षण से
सत्ता पर कब्जा पाया
समरसता को छोड़, घृणा से
आपस में है लड़वाया
सदियों से पुरखों की भूलें
आओं अब स्वीकार कर्रें
वंचित, शोषित भाई के सँग
शोषण का प्रतिकार करें
समरसता को आरक्षण का
मन्त्र तुम्हें समझाते है
क्या खोया है क्या पाया है
आज तुम्हे बतलाते है ॥
अफसर, नेता औ’ मंत्रीगण
भ्रष्ट आचरण करते है
स्विस बैंकों में जाकर सारे
माल लूट का भरते हैं
घोटालों की हवा चली है
आज विदुर के देश में
नहीं दीखता कोई परिवेश में
सविधान की झूठी कसमें
मक्कारी से खाते है
मेहनतकश जनता के धन से
नेता महल बनाते हैं
इनके घर में रोज़ दिवाली
गली गली में अँधियारा
सोने की चिड़िया को कैसे
घायल करके मारा है
‘भ्रष्टाचार मिटाओ’ का हम
पावन शंख बजाते हैं
क्या खोया है, क्या पाया है
आज तुम्हें बतलाते है ॥
Post a Comment