Sunday, January 27, 2008

मानव जीवन में सत्संग का महत्व



27 जनवरी 2008 को श्री भूपेन्द्र कौशिक के निवास पर एक सत्संग गोष्ठी का आयोजन किया गया। फरीदाबाद के प्रसिद्ध गायक श्री श्याम कालड़ा के सुमधुर भजनों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। भजन सत्संग के बाद हरिद्वार भारत माता मंदिर के संस्थापक परम पूज्य सत्यमित्रानन्द गिरी जी महाराज ने "मानव जीवन में सत्संग" विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम परम्परागत रूप से भक्ति तो करते हैं परन्तु इसमें निष्ठा और आस्था नहीं होती और बिना निष्ठा के प्रतिष्ठा नहीं मिलती। जब तक जयपुर के बाजार में मूर्ति रखी है वह केवल पत्थर है परन्तु जब हम मंत्रो द्वारा पत्थर में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं तब वह मूर्ति भगवान के रूप में प्रतिष्ठा पाती है। सत्संग के रूप में स्मरण माला करना अच्छा है परन्तु यदि इसके साथ सेवा को भी जोड़ दिया जाये तो यह अति उतम साधना है क्योंकि कहा भी गया है कि वैष्णव जन तो देने कहिये जे पीर पराई जाने रे। इसलिए वर्तमान सन्दर्भों में भी जब हम जनतंत्र व लोकतंत्र की बात करते हैं तो जनतंत्र व लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब उसमें षडयंत्र ना हो अतः इसके लिए मन की पवित्रता जरूरी है। रामचरितमानस का प्रसंग है पुष्प वाटिका में सीता को देखकर भगवान राम के मन में प्रेम उपजा और गुरुवर श्री विश्वामित्र को इस घटना का वर्णन करते हुए राम कहते है रघुकुल वंश की परम्परा के विरुद्ध आज मेरे मन में सीता को देखकर आसक्ति का भाव जागा है यही तत्व राम का रामत्व है। इसलिए राम राज्य में अहिंसा की पराकाष्ठा थी, शेर व बकरी एक घाट पर बिना हिंसा का भाव मन में लाए पानी पी सकते थे। योग वशिष्ठ में आता है कि आपके मन में यदि अहिंसा का भाव इस स्तर तक व्याप्त है तो शरीर से जो तरंगे निकलती है वह आपके सम्पर्क में आने वाले हिंसक से हिंसक प्राणी के मन को भी अहिंसक बना सकती है। एक ओर उदाहरण से इस विषय को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी ने कहा बाल्मिकी जो कि पूर्व में रत्नाकर नाम से लूट खसुट का कार्य किया करते थे जब देवर्षि नारद के सम्पर्क में आए तो नारद ने कहा तुम मुझे लूट सकते हो परन्तु जिनके लिए ये सब करते हो एक बार जाकर उनसे तो पूछ लो कि क्या वे तुम्हारे इस कार्य के फल में सम्मिलित होंगे और जब परिवार ने मना कर दिया तो उल्टा नाम मरा मरा का स्मरण कर रत्नाकर बाल्मिकी हो गए, ये है सत्संग की महिमा। स्वामी जी ने कहा मदिरा में डूबा व्यक्ति तो दो चार घंटे के लिए चित हो जाता है परन्तु मोह व अंधकार में डूबे व्यक्ति की कोई सीमा नहीं है अतः मोह अंधकार की मदिरा से बचने का एकमात्र रास्ता है सत्संग। तुलसीदास जी ने लिखा है - मति, कीर्ति, गति, भूति भलाई। अतः हम सत्संग में मन को लगाए तो सम्मान मिलेगा, जीवन का उद्धार होगा, वैभव भी मिलेगा परन्तु उस वैभव को लोक सेवा में लगाएं। मेवाड़ के राजा भागवत सिंह का उदाहरण देते हुए स्वामी जी बोले कि मेहमान को चांदी के बर्तनों में भोजन व स्वयं दोने पतल में भोजन करने वाले भागवत सिंह कहते थे कि महाराणा प्रताप ने जंगल जंगल घूमकर दोने पतल में भोजन किया अतः मैं आज भी त्यौहार के दिन उनको स्मरण करता हूं और दोने पतल में ही भोजन करता हूं। सत्संग की महता को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी ने कल्पवृक्ष के विषय में बताया कि कल्पवृक्ष के सम्मुख जैसी कल्पना करोगे वैसा ही होता है, भोजन चाहिए भोजन मिलेगा और यदि शेर की कल्पना करोगे शेर उपस्थित होगा, जो आपको ही खा जाएगा। भारत माता जग जननी है अतः जब भी भगवान को अवतार लेना होता है वे भारत में आते हैं क्योंकि दशरथ-कौशल्या, वासुदेव-देवकी जैसी साधना करने वाले लोग भारत में ही संभव है। अतः यदि भगवान को बुलाना चाहते हो तो सत्संग करो। स्वामी जी ने विषय को समपन करते हुए कहा भले ही टी वी सीरियल देखो परन्तु रात्रि को सोने से पूर्व कुछ अच्छा साहित्य या कम से कम रामचरितमानस की पाँच चौपाई ही पढ़ो और फिर सत्संग का परिणाम देखो।
इस सफल गोष्ठी में उतरांचल सरकार के मंत्री श्री मदन कौशिक, विधायक श्री रवीन्द्र बंसल, भारत माता ट्रस्ट, हरिद्वार के मुख्य ट्रस्टी श्री आई डी शास्त्री, पार्षद श्री हरीश अवस्थी, श्री प्रवेश वाही, श्री विनोद कुमार व अग्रोहा मेडीकल कालेज के वाइस चेयरमैन श्री जगदीश मित्तल व अन्य महानुभाव उपस्थित थें। इस गोष्ठी का संचालन कवि राजेश चेतन ने किया।
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