Wednesday, November 7, 2007

दोहे

अंग्रेजी पतझड़ गया, हिन्दी सावन आज
अब तो अपने देश में, हो हिन्दी का राज
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सोने की चिड़िया रहा, अपना भारत देश
सोना दुश्मन ले गया, चिड़िया रह गयी शेष
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कर्म भाग्य दोनों बड़े, इससे बढ़कर कौन
कर्म लग्न से कीजिए, भाग्य रहे ना मौन
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महालक्ष्मी जी दीजिए, निर्धन को वरदान
रोटी हो सम्मान की, सिर पर एक मकान

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त्याग शांति सुख सम्पदा, रंगों की पहचान
राष्ट्र पताका में छिपी, भारत भू की शान
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सदा दिवाली संत घर, कभी ना होता द्वन्द
दीप पर्व हो नित नया, आठो पहर आनंद
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समय चक्र से तेज है, जनसंख्या रफ्तार
कैसा होगा साथियों, भारत का उद्धार
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संसाधन सीमित सभी, युवा फिरे बेकार
नई सदी की दौड़ में, हार रही सरकार
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आओ यह संकल्प ले सीमित हो परिवार
शक्तिशाली राष्ट्र का, सपना हो साकार
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जन-जन भारतभूमि का, करे राष्ट्र से प्यार
इस कारण ही कर रहा, कागज काले चार
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पूर्वोत्तार जल रहा, घायल है कश्मीर
मन का दीपक बुझ गया फिर काहे की पीर
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भावुक्त्ता जब से भरी, मन की उड़ी उमंग
नीरज-नीरस जिंदगी, जैसे कटी पतंग
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दातून नाही दीखती, मंजन है लाचार
टूथपेस्ट बिकने लगा, गली-गली बाजार
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आयुर्वेद को छोड़कर, अंग्रेजी उपचार
आयु छोटी हो गई, खर्चा कई हजार
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लाठी जिसके हाथ है, भैंस उसी के संग
बासमति पर चढ़ गया, अमरीका का रंग
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अस्पताल उद्योग हैं, स्कूलों की भरमार
इससे अच्छा और क्या, दुनिया में व्यापार
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अल्पाहार अंडा हुआ, भोजन मांसाहार
पशु पक्षी भयभीत हैं, कैसा अत्याचार
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मंदिरा ना ही सोमरस, ये कष्टो की ख़ान
बोतल छोटी है मगर, ले लेती है जान
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गुड़ियों जैसा हो गया, नारी का सम्मान
अग्नि परीक्षा ले रहे, कलयुग के भगवान
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