Sunday, August 22, 2010

साहित्य के गलियारे में एक संत का पदार्पण

आचार्य महाप्रज्ञ के चित्र का अनावरण करते हुए महामहिम बी एल जोशी

नई दिल्ली। हिन्दी भवन में साहित्य तथा अध्यात्म के संगम की सुबह थी। अवसर था, तेरापंथ जैन समाज के नौवें आचार्य महाप्रज्ञ जी के तैलचित्र के अनावरण का!
उल्लेखनीय है कि हिन्दी भवन की दीवारों पर हिन्दी के उन साहित्यकारों के चित्र सुसज्जित हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में हिन्दी की महती सेवा की है। इसी क्रम में आचार्य महाप्रज्ञ के चित्र का अनावरण उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महामहिम बी.एल.जोशी ने किया।
इस अवसर पर तेरापंथ जैन समाज के वर्तमान अधिष्ठाता आचार्य महाश्रमण जी का संदेश मुनि अभिजीत कुमार ने पढ़ा। मुनि श्री प्रो. महेन्द्रकुमार के पावन सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल श्री टी.एन.चतुर्वेदी ने की। साहित्य अकादमी के सदस्य डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ ने इस अवसर पर महाप्रज्ञ जी के प्रति एक श्रध्दा गीत समर्पित किया- ‘तुम जीवन का उजियार बने, जैनत्व का दृढ़ आधार बने’।
सुप्रसिध्द संगीतकार व गायक श्री जितेन्द्र सिंह ने आचार्य महाप्रज्ञ के गीतों की संगीतमयी प्रस्तुति से कार्यक्रम को सुरमयी किया।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ.वेदप्रताप वैदिक ने आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- ‘वे अद्भुत साधु थे और साथ में महान पंडित भी थे। हिन्दी साहित्य में पिछले सौ-सवा सौ वर्ष में इतने जनोपयोगी ग्रंथ अन्यत्र नहीं मिलते जितने आचार्य महाप्रज्ञ ने रचे।’ उन्होंने डॉ. गोविन्द व्यास को साधुवाद देते हुए कहा कि ‘आज का ये समारोह जैन समाज के लिए ही नहीं अपितु समस्त हिन्दी समाज के लिए अविस्मरणीय है।’
महामहिम श्री बी.एल.जोशी ने इस अवसर पर कहा कि, ‘महाप्रज्ञ जी के पास बैठकर यह महसूस होता था कि वे विचारधारा पर चलने वाले महापुरुष मात्र न होकर विचारधारा के सृजनकर्ता थे।’ उन्होंने कहा कि, ‘आचार्य महाप्रज्ञ मुखौटे पहन कर जीने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे जैसे थे, वैसे दिखते थे।’
मुनिश्री प्रो. महेन्द्र जी ने इस अवसर पर आशीर्वचन स्वरूप कहा कि ‘जो व्यक्ति अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है वह कभी मर नहीं सकता। ऐसे ही व्यक्तित्व थे आचार्य महाप्रज्ञ। वे केवल जैन समाज के महापुरुष नहीं थे, बल्कि समस्त मानव जाति के आचार्य थे। वे एक ऐसे आत्मवेत्ता थे जिन्होंने ध्यान के माध्यम से चेतना की गहराइयों में डुबकी लगाई। उनका ज्ञान मात्र शास्त्रीय और पुस्तकीय नहीं था।’
श्री टी.एन.चतुर्वेदी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि, ‘महाप्रज्ञ जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने विज्ञान और धर्म के मध्य सेतु निर्माण का महान कार्य किया।’ उन्होंने कहा कि ‘अहिंसा के वे सबसे बड़े व्याख्याता रहे। संस्कृत तथा हिन्दी दोनों ही भाषाओं के तो वे विद्वान थे ही साथ ही साथ प्राकृत के भी वे प्रकाण्ड पण्डित थे। वे केवल धार्मिक व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि आचार तथा व्यवहार के सामंजस्य के उदाहरण थे।’
कार्यक्रम का संयोजन श्री राजेश भण्डारी और श्री राजेश ‘चेतन’ ने किया। श्रीमती सुनीता जैन ने समारोह का गरिमामयी संचालन कुशलतापूर्वक किया।
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