Monday, May 19, 2008

राजनीति और वैश्य समाज

मेरे मित्र चौधरी रमेश की नई मिठाई की दुकान पर अग्रवाल स्वीट्स का बोर्ड देखकर मैं चौंका। मैंने रमेश से पूछा चौधरी साहब आप अग्रवाल कब से हो गये, रमेश ने हरियाणवी में तुरन्त उत्तर दिया - भाई ! जाट की मिठाई कौन खावगा ? शायद ही दिल्ली के किसी प्रसिद्ध मार्केट का कोई कार्नर छूटा होगा हर तरफ अग्रवाल स्वीट, अग्रवाल स्वीट के बोर्ड ही दिखाई पड़ते हैं, कई बार तो लगता है कि अग्रवाल समाज का पुश्तैनी कारोबार ही हलवाई की दुकान हो परन्तु मित्रों असल में अपनी सेवा भावना के कारण चाहे मंदिर हो या धर्मशाला, विद्यालय हो या महाविद्यालय, एकल स्कूल हो या अनाथालय अग्रवालों ने भारतीय समाज में एक विश्वास बनाया है। अग्रवाल को समाज में बनिया भी कहा जाता है। कवि यूसुफ भारद्वाज ने ठीक ही कहा है - बनिया यानि जैसे सब्जी में धनिया। जैसे धनिया सब्जी में खुशबू फैलाता है वास्तव में समाज में वही कार्य बनिया कर रहा है।

भारतीय समाज को चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में बांटा गया है इस प्रकार वैश्य समाज के अन्तर्गत ही बनिया आता है। शास्त्रों में लिखा है कि ब्राह्मण राष्ट्र पुरुष का मुख है, क्षत्रिय भुजायें, वैश्य पेट और शुद्र चरण है। पेट का मतलब होता है उत्पादन व वितरण क्योंकि हम सब का जन्म भी माँ के पेट से ही हुआ है और शरीर में समस्त कोशिकाओं को ऊर्जा देने का कार्य भी पेट ही करता है।

एक जमाना था जब राजा का जन्म भी पेट से ही होता था उस समय राजा वैश्य समाज को बहुत सम्मान देता था। वैश्य को राजा के राज्य में साहुकार, महाजन और नगर सेठ के नाम से पुकारा जाता था, परन्तु वर्तमान में राजा पेट से नहीं पेटी से बनता है और पेटी में जिस समाज की शक्ति जैसी होती है उसको वैसा ही सम्मान मिलता है।

सरकार के खजाने को भरने का कार्य उत्पादन और वितरण के कारण ही होता है और ये कार्य वैश्य समाज ही कर रहा है। एक बार विचार करें यदि देश में 1-2 दिन के लिये उत्पादन और वितरण को बन्द दर दिया जाये तो क्या स्थिति होगी ? सरकार का खजाना भरने वाला वैश्य समाज आज लोकतंत्र में इतना उपेक्षित क्यों, कभी विचार किया ?

चाणक्य ने ठीक ही कहा है कि इस देश को दुष्टों की दुष्टता से इतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि सज्जनों की निष्क्रियता से। मित्रों, उत्पादन और वितरण से सरकार का खजाना भरना वैश्य समाज का काम, स्कूल, कालेज, मंदिर, धर्मशाला बनाना वैश्य समाज का काम तो क्या राजनीति करना वैश्य समाज का काम नहीं हो सकता ? वैश्य समाज की इस राजनीति निष्क्रियता के कारण राष्ट्र का बहुत नुकसान हो रहा है। अयोग्य, भ्रष्ट व असंवेदनशील लोगों के कारण राजनीति क्षेत्र अपनी गरिमा खोता जा रहा है।

अतः आज आवश्यकता है कि वैश्य समाज लोकतंत्र की इस वोट पेटी के महत्य को समझे और इस वोट पेटी में अपनी शक्ति के अहसास से समस्त पार्टियों को अवगत कराये। यदि वैश्य समाज राजनीति क्षेत्र में सक्रिय होगा तो निश्चित रूप से राजनीति क्षेत्र के लोगों का समाज में सम्मान बढ़ेगा।
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