Thursday, July 17, 2008

मुरारिलाल गोयल ‘शापित’ कृत ‘शापित सतसई’ की समीक्षा

भारतीय-चिंतन से ओतप्रोत दोहे-नरेश शांडिल्य

स्वर्गीय मुरारिलाल गोयल ‘शापित’ ने दोहा छंद को काफी हद तक सार्थक किया है। दोहा छंद की परम्परा और प्रवृतियों से वे पूरी तरह से वाकिफ थे, इस कारण भी इस छंद की ताकत का उन्होंने अच्छा इस्तेमाल किया है। उनके दोहों को पढ़कर आप कह पाएंगे कि उन्होंने केवल 11-13 की मात्राओं का ही निर्वाह नहीं किया है अपितु अपने कथ्य को एक ‘श्लोक’ या ‘मंत्र’ की तरह हमारे सामने प्रस्तुत किया है। अच्छे दोहे की विशेषता होती है कि उसमें ‘सार’ तत्व अधिक हो। केवल ‘नरेशन’ या विवरण ही न हो। इसका उन्होंने पूरा ख्याल रक्खा है। उनके दोहों में ‘कलापक्ष’ और ‘भावपक्ष’ का एक अच्छा समानुपात है। किसी चीज की ‘अति’ नहीं है। विचार से भी वे अतिवादिता के खिलाफ ही रहे हैं। उनके कुछ दोहे भी इसी विचारभूमि पर हैं –

जीवन में ‘अति’ अति बुरी / याते बुरो न और।
अतिवादी कूं जगत में / मिले न गज-भर ठौर॥

नहि अति सुन्दरता भली / नहि अति भलो कुरूप।
अतिशय भली न चांदनी / अतिशय भली न धूप॥


खास बात यह है कि उनके दोहों में सहजता और व्यवहारिकता बहुत है। उन्होंने अधिकांशतः जीवन के व्यवहारिक पक्षों को ही अपने दोहों का विषय बनाया है। इस कारण ये दोहे आपको विचारणीय ही नहीं, रोचक भी लगेंगे। नीतिगत बातों को, सिद्धांतों को, मूल्यों को वे सपाट रूप में हमारे सामने नहीं रखते, बल्कि बात के ‘मर्म’ को पकड़ते हुए एक आम आदमी को भी समझ आने वाली बोली और भाषा में बात के व्यवहारिक पहलू को सामने रखते है। ‘धर्म’ जैसे गूढ़ विषय को भी वे ‘रूढ़’ हो चुकी परिभाषाओं से बाहर खींच कर लाते हैं और एक आम आदमी को भी उसका मर्म समझाने की चेष्टा करते हैं –

धर्म न पूजा-पाठ में / नहीं ध्यान-निष्कर्म।
देशकाल सामर्थ्य सम / जीव-कर्म ही धर्म॥


‘जीव कर्म ही धर्म’ यानि हम जीव रूप में जो हैं, वही हमारा धर्म है। अगर हम इन्सान रूप में जन्मे हैं तो इन्सानियत ही हमारा धर्म होना चाहिए। यहां वे ‘देशकाल’ और ‘सामर्थ्य’ की बात भी करते हैं, जो व्यवहाररूप में उनकी बात को ‘सार्वभौमिकता’ का ‘टच’ भी देती है। ऐसा कहना एक ‘बड़ा कवि’ हुए बिना सम्भव नहीं है। ऐसी दृष्टि, ऐसी उदारता, ऐसी व्यापकता एक अच्छे और सच्चे साहित्यकार में ही हो सकती है।

एक सौ साठ पृष्ठों की इस पुस्तक में, गोयल जी ने दोहा परम्परा से जुड़े लगभग हर विषय पर अपनी कलम चलाई है। स्वास्थ को लेकर लिखे गए उनके दोहे तो बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं –

भोजन करके तुरत ही / लघुशंका को जाय।
दांत भींच शंका करे / शुगर पास नहीं आय॥


बीज मंत्रों के रूप में अनेकानेक आमफहम बीमारियों के देसी इलाज के नुस्खे उन्होंने दोहों के माध्यम से सामने रखे हैं। गुरु परम्परा को पुष्ट करते दोहे भी काफी संख्या में हैं। हालांकि यह पुरानी परम्परा अब धीरे-धीरे समाप्त सी हो रही है क्योंकि न अब वैसे ‘गुरु’ हैं और न अब वैसे ‘चेले’। लेकिन एक अच्छा साहित्यकार लुप्त होती जा रही अच्छी परम्पराओं के बारे में स्वयं भी सजग रहता है और समाज को भी चेताता रहता है। वह इसे एक प्रकल्प की तरह अपने एजेंडे में लगातार शुमार रखता है –

परम मंत्र विश्वास है / गुरुमुख निकला शब्द।
दृढ़ निश्चय नियमित जपे / व्यक्त होय अव्यक्त॥


‘शापित’ जी ने राष्ट्रीय चेतना को अपने दोहों में पर्याप्त स्थान दिया है। उनकी वैचारिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता उनके लेखन में बार-बार मुखरित होती है। ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान’ के प्रति उनमें गहरी आस्था है। लेकिन यह आस्था ओढ़ी हुई नहीं बल्कि अनुभवों से पगी लगती है। उनकी सोच में कोई दुराव-छिपाव, कोई बनावट या कोई आडम्बर नहीं है, अपितु एक ‘क्लीयर-कट’ निष्ठा और आस्था का प्रगटीकरण है।

सार रूप में कहा जा सकता है कि शापित जी ने अपने दोहों में ‘भारतीय-चिंतना’ को विविध रूपों में व्याख्यापित किया है। उनके दोहों का मूल स्वर भी यही है। आस्तिकता पर आस्था, ईश्वरीय सत्ता में विश्वास, गुरु-शिष्य परम्परा में श्रद्धा, गीता और गंगा का महिमा गान, धर्म की अवधारणा और पुनर्जन्म की थ्योरी का अंगीकार इत्यादि ‘शापित’ जी को भारीय चिंतना का ‘ध्वजवाहक’ सिद्ध करते हैं और उनके दोहों को भारतीय-दृष्टिकोण के संवाहक के रूप में पेश करते हैं।

पुस्तक की साज-सज्जा, छपाई और आवरण-पृष्ठ बहुत आकर्षक है।
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