Tuesday, July 22, 2008

काव्य गोष्ठी

दिनांक 21 जुलाई 08 को राष्ट्रीय कवि संगम के बैनर तले कविवर श्री यूसुफ भारद्वाज के निवास स्थान पर प्रथम काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कवियों ने अपने विचार कुछ यूं प्रकट किये -


मोटा होने के लिए, मैंने क्या-क्या तरकीब नहीं आजमाई
मगर हर बार मैंने, एक नई मुसीबत पाई
अमर नाथ 'आकाश'





रोज देके उसको प्रपोज किया यार मैंने,
तब से तो रोज रोज रोज दे रहा हूं मैं।
मुरझाई प्यार की लता न पल्लवित हुई,
यूरिया में घोल ग्लूकोज दे रहा हूं मैं॥
ब्रजेश द्विवेदी




भय, भूख और भ्रष्टाचार बढ़े हैं,
कर्णधार देश के सोए पड़े हैं,
बेरोजगारी, मंहगाई बढ़ी है,
बिजली और पानी की समस्या खड़ी है,
आम आदमी का जीना हुआ है मुहाल,
शर्म से झुक गया मां भारती का भाल।
कलाम भारती


बिपाशा की गली नहीं दाल देखिए
मल्लिका के कपड़ो का जाल देखिए
राखी के बिल्ली जैसे गाल देखिए
शिल्पा के चुम्बन का हाल देखिए
कर दे ये रात में ही भौर देखिए
ऊँट बैठता है किस ओर देखिए
हरमिन्द्र पाल


निज चरणों से नित्य आपने लात देश को मारी,
खा गए देश को ऐसे जैसे हो तरकारी,
बुद्धिमान तुम्हे जान के चुनते हम हर बार,
बल, बुद्धि, विद्या छीनी सब बढ़ाया क्लेश विकार॥
दीपक सैनी



हो रहे जुल्म सदियों से सताया जा रहा इसको
व्यंग्य वाणों की पीड़ा से रूलाया जा रहा इसको
सताया जा रहा इसको सजाएं सह रही कबसे
आड़ लेके रसोई की जलाया जा रहा इसको
अनिल गोयल



सोनिया यूं बोली - कुछ करो मनमोहना जी,
मुझे डाँवाडोल सरकार यह बचानी है।
मेंढ़की से दल भी है टर-टर कर रहे,
गरज रहा यह बार-बार आडवाणी है।
वाम जिस लुटिया में खीर खाते रहे सदा,
कहते हैं उन्हें वही लुटिया डुबानी है।
मनमोहना जी बोले - फिक्र करो न देखो,
मेरे घर आए आज मित्तल अंबानी हैं।
डा॰ अशोक बत्रा


मान और सम्मान भरा था हम सब आदर करते थे
गुस्सा हैं या खुश बाबूजी हम भावों को पढ़ते थे
अब बाबूजी हमको अपने बच्चों से डर लगता हैं
आँख दिखाते हैं ये हमको, हम आँखों से डरते थे
ॠतु गोयल



सौ टुकड़े जोड़ के बनाया था एक तुझे,
लाठी लंगोटी में खड़ा अभी देख मुझे,
फिर से तू सौ टुकड़े होने को आमादा,
भूल गया बलिदानी जन से अपना वादा,
तू ही तो था वो मेरे देश कि जिसपर हम हवन हो गए।
कृष्णकान्त मधुर


रंग दे बसन्ती चोला गाकर, जो फाँसी पर झूल गए,
उन आजादी के परवानो को, हम कैसे भूल गए।
प्रीति 'विश्वास'







प्यार के दो बोल, बोल के देखना,
रंग जरूर बदलेंगे, माहौल के देखना।
विनोद 'विक्रम'





एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुबह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा
तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा
चिराग जैन



ना हंस के सीखोगे, ना रो के सीखोगे
जब भी सीखोगे, किसी के हो के सीखोगे
स्वदेश जैन
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